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Wednesday, August 15, 2012

नैनीताल में ऐसे मनाया गया था 15 अगस्त 1947 को पहला स्वतंत्रता दिवस


अब वतन आजाद है....
रिमझिम वर्षा के बीच हजारों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था माल रोड पर
पेड़ों पर भी चढ़े थे लोग आजादी की नई-नवेली सांसें लेने
नवीन जोशी, नैनीताल। अंग्रेजों के द्वारा बसाये गये और अनुशासन के साथ सहेजे गये नैनीताल नगर में आजाद भारत के पहले दिन यानी 15 अगस्त 1947 को नगर वासियों के उत्साह का कोई सानी नहीं था। लोग नाच-गा  रहे थे। 14 अगस्त की पूरी रात्रि मशाल जुलूस निकालने के साथ ही जश्न होता रहा था, बावजूद 15 की सुबह तड़के से ही माल रोड पर जुलूस की शक्ल में निकल पड़े थे। कहीं तिल रखने तक को भी जगह नहीं थी। 100 वर्षों की गुलामी और हजारों लोगों के प्राणोत्सर्ग के फलस्वरूप उम्मीदों के नये सूरज की नई किरणों के साथ हवाऐं भी आज मानो बदली-बदली लग रही थीं, और प्रकृति मानो रिमझिम बारिश के साथ आजादी का स्वागत कते हुऐ देशवासियों के आनंद में स्वयं भी शामिल हो रही थी। लोगों में जश्न का जुनून शब्दों की सीमा से परे था। हर कहीं लोग कह रहे थे-अब वतन आजाद है...।
वर्तमान मंडल मुख्यालय सरोवरनगरी उस दौर में तत्कालीन उत्तर प्रांत की राजधानी था। अंग्रेजों के ग्रीष्मकालीन गवर्नमेंट हाउस व  सेकरेटरियेट यहीं थे. इस शहर को अंग्रेजों ने ही बसाया था, इसलिये इस शहर के वाशिंदों को उनके अनुशासन और ऊलजुलूल आदेशों के अनुपालन में ज्यादतियों से कुछ ज्यादा ही जलील होना पढ़ता था। अपर माल रोड पर भारतीय चल नहीं सकते थे। नगर के एकमात्र सार्वजनिक खेल के फ्लेट  मैदान में बच्चे खेल नहीं सकते थे। शरदोत्सव जैसे ‘मीट्स’ और ‘वीक्स’ जैसे कार्यक्रमों में भारतीयों की भूमिका बस ताली बजाने की होती थी। भारतीय अधिकारियों को तक खेलों व नाचघरों में होने वाले मनोरंजन कार्यक्रमों में अंग्रेजों के साथ शामिल होने की अनुमति नहीं  होती थी। 
15 अगस्त 1947 को मल्लीताल पन्त मूर्ति पर उमड़ा लोगों का हुजूम  
ऐसे में 14 अगस्त 1947 को दिल्ली से तत्कालीन वर्तमान पर्दाधारा के पास स्थित म्युनिसिपल कार्यालय में फोन पर आये आजादी मिलाने के संदेश से जैसे नगर वासियों में भारी जोश भर दिया था। सीआरएसटी इंटर कालेज के पूर्व अध्यापक व राष्ट्रीय धावक रहे केसी पंत ने बताया, "लोग कुछ दिन पूर्व तक नगर में हो रहे सांप्रदायिक तनावपूर्ण माहौल को भूलकर जोश में मदहोश हो रहे थे। एक समुदाय विशेस के लोग पाकिस्तान के अलग देश बनने, न बनने को लेकर आशंकित था, उन्होंने तल्लीताल से माल रोड होते हुए मौन जुलूस भी निकाला था। इन्हीं दिनों नगर में (शायद पहले व आखिरी) सांप्रदायिक दंगे भी हुऐ थे, जिसमें राजा आवागढ़ की कोठी (वर्तमान वेल्वेडियर होटल) भी फूंक डाला गया था। 
बावजूद 15 अगस्त को नगर में  हर जाति-मजहब के लोगों का उत्साह देखते भी बनता था। स्कूल के प्रधानाचार्य पीडी सनवाल ने पहले दिन ही बच्चों को कह दिया था, देश आजाद होने जा रहा है, कल सारे बच्चे साफ कपडे पहन कर आयेंगे"। 
दूसरे दिन बच्चों ने सुबह तल्लीताल गवर्नमेंट हाईस्कूल (वर्तमान जीआईसी) तक जुलूस निकाला, वहां के हेड मास्टर हरीश चंद्र पंत ने स्मृति स्वरूप सभी बच्चों को 15 अगस्त 1947 लिखा पीतल का राष्ट्रीय ध्वज तथा टेबल पर दो तरफ से देखने योग्य राष्ट्रीय ध्वज व उस दिन की महान तिथि अंकित फोल्डर प्रदान किया था। उन्होंने भाषण दिया, "अब वतन आजाद है। हम अंग्रेजों की दासता से आजाद हो गये हैं, पर अब देश को जाति-धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर एक रखने व नव निर्माण की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है"। इस ध्वज को श्री पंत आज तक सहेजे हुऐ हैं। वहीँ वयोवृद्ध शिक्षाविद् प्यारे लाल साह के अनुसार 14 अगस्त की रात्रि ढाई-तीन बज तक जश्न चलता रहा था। लोगों ने रात्रि में ही मशाल जुलूस निकाला। देर रात्रि फ्लेट्स मैदान में आतिशबाजी भी की गई। सुबह म्युनिसिपालिटी में चेयरमैन रायबहादुर जसौंत सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में बैठक हुई। तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर (सभासद) बांके लाल कंसल ने उपाध्यक्ष खान बहादुर अब्दुल कय्यूम को देश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करते हुए पीतल का तिरंगा बैच के रूप में लगाया। 
15 अगस्त 1947 को फ्लेट्स मैदान में परेड की सलामी लेते तत्कालीन एडीएम आरिफ अली शाह  
चेयरमैन ने यूनियन जैक तारकर तिरंगा फहरा दिया। इधर फ्लेट्स मैदान में तत्कालीन एडीएम आरिफ अली शाह ने परेड की सलामी ली। उनके साथ पूर्व चेयरमैन मनोर लाल साह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्याम लाल वर्मा व सीतावर पंत सहित बढ़ी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद थे। उधर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डुंगर सिंह बिष्ट के अनुसार उनके नेतृत्व में हजारों लोगों ने जनपद के दूरस्थ आगर हाईस्कूल टांडी से आईवीआरआई मुक्तेश्वर तक जुलूस निकाला था। बिष्ट कहते हैं, "उस दिन मानो पहाड़ के गाड़-गधेरों व जंगलों में भी जलसे हो रहे थे"।

2 comments:

  1. Very interesting and very well researched.Just one thing,as far as I remember the Pant statue was installed around seventies in Mallital.

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    1. Thanks Abha ji (yah meri chhoti bahan kaa naam bhi hai). Matlab vartman Pant moorti se hai...

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