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Tuesday, January 1, 2013

क्या वाकई जाग गया देश ?


दिल्ली में चलती बस में बहशी दरिंदों की हवस से सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई पैरामेडिकल की छात्रा की मौत पर कहा जा रहा है उसकी चिता मशाल बन 125 करोड़ देशवासियों को जगा गई है। दिल्ली में इंडिया गेट से लेकर मीडिया-समाचार पत्रों और सोशियल मीडिया पर आज यही चर्चा है, जैसे कुछ दिन पहले केजरीवाल, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की चर्चा थीं (तब भी देश को जागा हुआ बताया जा रहा था)। 
इस सबसे थोड़ा आगे निकलते हैं। मीडिया, समाचार पत्रों में धीरे-धीरे उसकी खबरें पीछे होती चली जाएंगीं। सोशियल मीडिया में लोगों की प्रोफाइल पर लगे काले धब्बे भी जल्द हटकर वापस अपनी या किसी अन्य खूबसूरत चेहरे की आकर्षक तस्वीरों से गुलजार हो जाएंगे। अखबरों, चैनलों में कभी संदर्भ के तौर पर यह आएगा कि 16 दिसंबर 2012 को पांच बहशी दरिंदों ने दिल्ली के बसंत विहार इलाके में चलती बस में युवती से बलात्कार किया था, और उसे उसके मित्र के साथ महिपालपुर इलाके में नग्नावस्था में झाड़ियों में फेंक दिया गया था। यह नहीं बताया जाएगा कि करीब आधे घंटे तक सैकड़ों लोग उन्हें बेशर्मी से देखते हुए निकल गऐ थे, और आखिर पुलिस ने पास के होटल से चादर मंगाकर उन्हें ढका और दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया, और जहां से हृदयाघात होने के बावजूद कमोबेश मृत अवस्था में ही उसे राजनीतिक कारणों से 27 दिसंबर को सिंगापुर ले जाकर वहां के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 29 दिसंबर की सुबह तड़के 2.15 बजे उसने दम तोड़ दिया, लेकिन पूरे दिन रोककर रात्रि के अंधेरे में उसके शरीर को दिल्ली लाया गया और 30 की सुबह तड़के परिवार के कथित तौर पर विरोध के बीच उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। ऐसा इसलिए ताकि लोग आक्रेाशित ना हों, कानून-व्यवस्था के भंग होने की कोई स्थिति न उत्पन्न हो। क्योंकि पूरा देश कथित तौर पर जाग गया था....! 
आगे, चाहे जितने दावे किए जाएं, बेहद लंबी कशमकश और कानूनी लड़ाई के बाद शायद उसके बलात्कारियों और हत्यारों को शायद फांसी दे ही दी जाए। इससे पहले बलात्कारियांे, हत्यारों को फांसी की मांग करने वाले अनेक अधिवक्ता उन्हें फंासी देने का भी विरोध करेंगे। न्यायाधीश महोदय भी पूछेंगे कि क्यों फंासी ही दी जाए, आखिर हमारे कानून की भावना जो ठहरी-”एक भी निर्दोष न फंसे“ (चाहे जितने दोषी बच जाएं, और अनगिनत र्निदोष सीखचों के पीछे ट्रायल के नाम पर ही बर्षों से सजा भुगतते रहें।)

यूं भी शायद ही रुक पायें बलात्कार 
और हमारी संसद, पश्चिमी दुनिया के लिव-इन संबंधों को अपने यहां भी कानूनी मान्यता देने व विवाह जैसी सामाजिक संस्था के लिए पंजीकरण की कानूनी बाध्यता बनाने और यौन संबंधों में आपसी सहमति के लिए आयु को कम करने की पक्षधरता के बीच शायद बलात्कार को भी ”रेयर“ और ”गैर रेयर“ के अलावा कुछ अन्य नए वर्गों में भी वर्गीकृत कर दे। उम्र (नाबालिगों से सहमति के यौन संबंध भी बलात्कार की श्रेणी में हैं) व लिंग (महिलाओं, पुरुषों व किन्नरों के आधार पर तो बलात्कार के लिए भी कमोबेश अलग-अलग कानूनी प्राविधान) के साथ ही हमारे माननीय बलात्कार को जाति-वर्ण के आधार पर भी बांट दें, यानी जाति विशेष की महिलाओं से बलात्कार पर अधिक या कम सजा के प्राविधान हो जाएं तो आश्चर्य न होगा। ऐसे-ऐसे तर्क भी आ सकते हैं कि दूसरों के केवल गुप्त यौननांगों पर बलात आक्रमण या प्रयोग ही क्यों बलात्कार कहा जाए, पूरा शरीर और अन्य अंगों पर क्यों नहीं। बहरहाल, इन सब कानूनी बातों और केवल इस एक मामले में कड़ा न्याय मिल जाने के बावजूद क्या दिल पर हाथ रखकर कहा जा सकता है कि देश में ऐसी घटनाओं पर रोक लग जाएगी ? क्या हमारी बहन-बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी ?
इस सबसे इतर, मेरा मानना है कि हमारी बहुत सी समस्याएं लगती तो शारीरिक हैं, लेकिन होती मानसिक हैं। जैसे स्पांडलाइटिस सहित अनेक रोग होते तो मूलतःतनाव से हैं, लेकिन शरीर हो दुःख पहुंचाते हैं, इसलिए उनका इलाज भी शरीर को दवाई देकर करने की कोशिश की जाती है, जबकि उपचार मन का किए जाने की जरूरत होती है। बलात्कार भी एक तरह से तन से पहले मन की बीमारी है। और इसकी जड़ में समाज के अनेक-शिक्षा, लिंग, सामाजिक-आर्थिक स्तर के विभेद जैसे अनेक कारण हैं। कानून, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था का प्रभाव तो बहुत देर में आता है। 
इससे आगे बढ़ते हुऐ अच्छा न होगा कि भूख और सैक्स का मनोविज्ञान समझा जाए, भूख को पेट की और सैक्स को शरीर की आग और दोनों को बेहद खतरनाक भी कहा जाता है।सैक्स की आग में शरीर की भूख के साथ ही मन की भी बड़ी भूमिका होती है, जिस पर मनुष्य की शैक्षिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति भी अत्यधिक प्रभाव डालती है। निठारी कांड इन दोनों भूखों को नृशंशतम् मामला था जिसमें कहा जाता है कि इन दोनों भूखों के भूखे भेड़िये दर्जनों मासूम बच्चों का बलात्कार करने के बाद उनके शरीर को भी खा गए। अफसोस, हमारी याददाश्त बेहद कमजोर होती है। हम इस कांड को कमोबेश भूल चुके हैं। मीडिया भी उसी दिन याद करता है, जब न्यायालय से इस मामले में कोई अपडेट आती है। वर्षों से मामला न्यायालय में चल रहा है। और इस ”रेयरेस्ट ऑफ द रेयर“ मामले में दोषियों को कब सजा होगी, कुछ नहीं कहा जा सकता। 
एक आंकलन के अनुसार हमारे देश में केवल चार प्रतिषत बलात्कार के मामले ही अनजान लोगों द्वारा किए जाते हैं, यानी 96 प्रतिशत बलात्कार जानने-पहचानने वालों द्वारा किए जाते हैं। ऐसे में यह ही देखना होगा कि बलात्कार के साथ ही अवैध संबंध बनाने वालो का क्या मनोविज्ञान है। 
इसे पहले आयु के आधार पर देखते हैं। कम उम्र के बच्चों (लड़के-लड़कियों दोनों में, भारत में अभी कम, विदेशों में काफी) में टीवी, सिनेमा व इंटरनेट की देखा-देखी और सैक्स व जननांगों के बारे में जानने की इच्छा, जिज्ञासा (क्यूरियोसिटी) के कारण सैक्स संबंध बनाए जाते हैं। युवावस्था में युवक-युवतियों दोनों में शारीरिक और यौन अंगों का विकास होने के साथ यौन इच्छाएं भी नैसर्गिक रूप से बढ़ती हैं। सामाजिक व्यवस्था भी उन्हें बताती जाती है कि अब आप विवाह एवं यौन संबंध बनाने योग्य हो गऐ हो। यहां आकर व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक स्थित उसकी यौन इच्छाओं को प्रभावित करती है। अच्छे आर्थिक व सामाजिक स्तर के लोगों में इस स्थिति में अपने लिए मनपसंद जीवन साथी प्राप्त करने की अधिक सहज स्थिति रहती है, जबकि इन दोनों मामलों में कमजोर तबके के लोगों के लिए यह एक कठिन समय होता है। इस कठिन समय पर यदि व्यक्ति को उसका मनपसंद साथी ना मिल पाए तो उसे अच्छी और संस्कारवान, नैतिक शिक्षा ही संबल व शक्ति प्रदान कर सकती हैं। अन्यथा उनके भटकने का खतरा अधिक रहता है। इस उम्र में कुछ लोग, खासकर युवक शराब जैसे बुरे व्यसनों की गिरफ्त में फंसकर और अपनी कथित पौरुष शक्ति के प्रदर्शन की कोशिश में युवतियों से छेड़छाड़ और बलात्कार की हद तक जा सकते हैं। बलात्कार केवल महिलाओं, आधी आबादी के लिए ही नहीं संपूर्ण समाज के लिए अभिषाप और मानवता पर कोढ़ की तरह है।
इससे आगे प्रौढ़ अवस्था में विवाहितों और अविवाहितों में यौन इच्छाऐं (मन के स्तर से ही) पारिवारिक स्तर पर तृप्त या अतृप्त होने पर निर्भर करती हैं। और यह भी बहुत हद तक मनुष्य की आर्थिक, शैक्षिक व सामाजिक स्तर पर निर्भर करता है। इन तीनों स्तरों के समन्वित प्रभाव से ही मनुश्य स्वयं में एक तरह की शक्ति या कमजोरी महसूस करता है। शक्ति की कमजोरी की स्थिति में आकर गिरा व्यक्ति इससे बुरा क्या होगा की दशा में बुराइयों की दलदल में और धंसता चला जाता है, जबकि शक्ति के उच्चस्तर स्तर पर आकर भी व्यक्ति में सब कुछ अपने कदमों पर आ गिरने जैसा अहम और कोई क्या बिगाड़ लेगा का दंभ भी उसे ऐसे कुकृत्य करने को मजबूर करता है, और वह अपने बल से अपनी आवश्यकताओं को जबर्दस्ती जुटा भी लेता है, और फिर बल से ही लोगों का मुंह भी बंद कराने में अक्सर सफल हो जाता है। कमजोर वर्ग के लोगों के मामले जल्दी प्रकाश में आ जाते हैं। दिल्ली कांड में भी बलात्कारी कमोबेश इसी वर्ग के हैं। कोई ड्राइवर, क्लीनर, कोई सड़क पर फल विक्रेता, और एक कम उम्र युवक। यानी किसी की भी आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक स्थिति बहुत ठीक नहीं है। वहीं, मध्यम वर्ग के लोगों में सहयोग से या ”पटा कर (जुगाड़ से)“ काम निकालने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। यह वर्ग कोई बुरा कार्य करने से पहले सामाजिक स्तर पर डर भी अधिक महसूस करता है, इसलिए एक हद तक बुराइयों से बचा भी रहता है। 
दूसरी ओर, बालिकाओं के प्रति आज भी समाज में बरकरार असमानता की भावना बड़ी हद तक जिम्मेदार है। माता-पिता के मन में उसे पैदा करने से ही डर लगता है कि वह पैदा हो जाएगी तो उस ”लक्ष्मी“ के आने के बावजूद बधाइयां नहीं मिलेंगी। उसे, स्कूल-कालेज या कहीं भी अकेले भेजने में डर लगेगा। फिर उस ”पराए धन“ को कैसा घर-बर मिलेगा। और इस डर के कारण बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। पैदा हो जाती है तो उसे यूं ”घर की इज्जत“ कहा जाता है, मानो वह हर दम दांव पर लगी रहती है। ससुराल में भी पह ”पराई“ ही रहती है, और उसे ”डोली पर आने“ के बाद ”अर्थी पर ही जाने“ की घुट्टी पिला दी जाती है कि वह कदम बाहर निकालने की हिमाकत न करे। बंधनों में कोई बंधा नहीं रहना चाहता। वह भी ”सारे बंधन तोड़कर उड़ने“ की कोशिश करती है। आज के दौर में पश्चिमीकरण की हवा में टीवी- सिनेमा और इंटरनेट उसकी ”उड़ानों को पंख“ देने का काम कर रहा है। इस हवा में उसका अचानक ”उड़ना“ बरसों से उसे कैद कर रखने वाला पुरुष प्रधान समाज कैसे बर्दास्त कर ले, यह भी एक चुनौती है। यह संक्रमण और तेजी से आ रहे बदलावों का दौर है। इसलिए विशेश सतर्क रहने की जरूरत है।
लिहाजा, यह कहा जा सकता है कि बलात्कार केवल एक शब्द नहीं, मानव मात्र पर एक अभिषाप है। इसके लिए किसी एक व्यक्ति, महिला या पुरुष, जाति, वर्ण, वर्ग को एकतरफा दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भले ही एक व्यक्ति बलात्कार करता हो, लेकिन इसके लिए पूरा समाज, हम सब, हमारी व्यवस्था दोषी है। लिहाजा, इसके उन्मूलन के लिए चतुर्दिक व सामूहिक प्रयास करने होंगे। और यह सब हमारे हाथ में है, जब कहा जा रहा है कि दिल्ली की घटना के बाद पूरा देश जाग गया है। ऐसे में अच्छा न हो कि अदालत से इस एक मामले में चाहे जो और जब परिणाम आए, उसमें शायद समय भी लगे, उससे पूर्व ही हम सब मिलकर मानवता पर लगे इस दाग को हमेशा के लिए और जड़ से मिटा दें। 

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9 comments:

  1. bahot khoob likha h sir...

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  2. हरिजन उत्पीडन ,दहेज़ उत्पीडन इस तरह के कई क़ानून हैं क्या उत्पीडन मेंकोई कमी आई एक नया महिला योंन उत्पीडन का भी क़ानून बनने के बाद भी परिस्थितियों में कोई आमूल चूल परिवर्तन नहीं आने वाला इसके विपरीत ब्लेक नालिंग का एक नया आयाम शुरू हो जायेगा .......

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  3. नवीनदा अच्‍छा और सटीक विश्‍लेषण है पर सबसे बडा सवाल की आखिर जब पूरा सिस्‍टम दोषी है तो शुरूआत कहॉ से........ कानून उसी के लिये बना है जो पालन करता है बॉकी कानून बनाने वाला उसकी लू पोल जानकर उसका तोड् आपको बता देगा्््््््् पर मेरा अपना विचार है बलात्‍कार रोज हो रहे है, देश रोज टूट रहा हैृृृृृ कारण फिर वही दोगली नीति और केवल वोट बैंक की राजनीति. ...हर कानून का दुरूपयोग ही हुआ है चाहे वह दहेज एक्‍ट हो, एस0सी0 एक्‍ट हो या कोई और........सब उनका फायदा है जिनका अपना लाभ नीहित है क्‍या किसी वास्‍तविक पात्र को लाभ मिल पाया है. मेरे अपने विचार से नहीं.....

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  4. चंद सिक्को में बिकता ईमान देख रहा हूँ
    लोगो का पेट काटते झूठे बेईमान देख रहा हूँ
    कैसा करिश्मा है देखो इस अंधे कानून का
    कुर्सियों पर चोरो को विराजमान देख रहा हूँ
    इक दूजे का गला काटते देख रहा हूँ
    क्या क्या नहीं देख रहा अब मत पूछ मुझसे
    सूनी नजरो से घायल हिंदुस्तान देख रहा हूँ.

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  5. Moan Chandra JoshiJanuary 2, 2013 at 6:49 PM

    आपने इस समस्या क बहुत सुन्दर विवेचन किया है और मे उस से पूर्णतः सहमत हू मेरे विचार मे एक कदम आगे जा कर हिन्दू धर्म संबन्धी कानून मे एक परिवर्तन यह करना चाहिये कि पुत्र के समान पुत्री से भी वंश चलेगा | ऐसी स्थिति मे पुत्री का जन्म अभिशाप नही समझा जायेगा और इस से कई सामाजिक समस्याऐ दूर हो जायेगी |

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  6. नवीन जोशी जी, आपने अपने लेख में जो सवाल उठाये हैं या जो तथ्य दिए हैं वो सहमती की ओर ले जाते हैं ! सही कहा आपने अब जो हो हल्ला हो रहा है वो धीरे धीरे ख़त्म होते चला जाएगा और सब लोग इस बात को भूल जायेंगे या फिर इसकी तीव्रता कम हो जाएगी और निठारी काण्ड के जैसे अकबारों में कभी कभार ही इसकी बात आएगी ! लेकिन एक बात तो आपको माननी ही पड़ेगी की कोई भी व्यक्ति एक ही बात को लेकर हमेशा जिन्दा नहीं रह सकता ऐसे ही मीडिया भी एक ही केस को लेकर अपने आप को जिन्दा नहीं रख सकता ! ये क्या कम है की मीडिया और अन्य लोगों ने इस केस में इतना काम किया है ! दूसरी बात की आपने कहा इस केस में ज्यादातर लोग निम्न वर्ग के हैं इसलिए ये ज्यादा फ़ैल गया , मैं सहमत नहीं हूँ इस बात से ! उन्होंने जितनी वीभत्सता दिखाई वो हैवानियत को भी शर्मसार करती है !

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  7. First of all we have to make our men/boys sensitive towards girls, so that they feel normal with/among girls.

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  8. aap ke sujhav me kayi binduo par india me bhi bichar ho sakte hai ....esse balatkar jaise shawal hi mit jayenge ...

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